Agricultural scientist MS Swaminathan passes away: आज भारत ने उस शख्स को खो दिया जिसने भारत में हरित क्रांति लाकर देश को सम्मान से जीना सिखाया। जी हां आज देश के महान वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का निधन हो गया है। एमएस स्वामीनाथन न सिर्फ महान कृषि वैज्ञानिक थे, बल्कि एक दूरदर्शी व्यक्ति भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश के कृषि क्षेत्र में सुधार पर ही लगा दिया।
आज एमएस स्वामीनाथन का 98 साल की उम्र में चेन्नई में निधन हो गया। उनका जन्म 7 अगस्त 1925 को केरल के कुंभकोणम में हुआ था। उनका पूरा नाम मोनकोंबू संबासिवन स्वामीनाथन था।
एमएस स्वामीनाथन को 1960 के दशक के दौरान भारत में उच्च उपज देने वाली गेहूं और चावल की किस्मों को विकसित करने के लिए पहला विश्व खाद्य पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। स्वामीनाथ ने उस वक्त निर्णयाक भूमिका निभाई जब देश को व्यापक अकाल का सामना करना पड़ा। उनकी तैयार की गई चावल और गेंहू की उन्नत किस्मों से कुछ ही वर्षों में गेहूं का उत्पादन दोगुना हो गया था। इसके बाद देश खेती में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया।
उन्होंने अपनी योग्यता और कुशलता से लाखों लोगों को भोजन अभाव से बचाया। स्वामीनाथन को पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें 1971 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, 1986 में अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व विज्ञान पुरस्कार सहित कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इसके अलावा, एच के फिरोदिया पुरस्कार, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार और इंदिरा गांधी पुरस्कार भी दिया गया।
स्वामीनाथन ने अपने महान मिशन को कायम रखने और स्थायी प्रभाव पैदा करने के लिए, एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की थी। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने भूख और गरीबी उन्मूलन के लिए अपना अथक प्रयास जारी रखा। फाउंडेशन देश में कृषि के क्षेत्र में आशा की किरण के रूप में कार्य करता है।
संस्थान किसानों को ज्ञान और नवीन कृषि तकनीकों से सशक्त बनाता है। स्वामीनाथन ने अपने करियर में प्रशासन में अनेक पदों पर काम किया। उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का निदेशक (1961-72), आईसीएआर का महानिदेशक और भारत सरकार का कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग का सचिव (1972-79), कृषि मंत्रालय का प्रधान सचिव (1979-80) की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा वह योजना आयोग (1980-82), सदस्य (विज्ञान और कृषि) अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, फिलीपींस (1982-88) में महानिदेशक भी रहे।
भारत सरकार ने 2004 में, स्वामीनाथन को राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। किसानों के आत्महत्या के मामलों के बीच किसान संकट को देखने के लिए एक आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने 2006 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग ने अपनी सिफारिशों में सुझाव दिया कि न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) उत्पादन की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए।
1950 के दशक में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में एक युवा वैज्ञानिक के रूप में अपना करियर शुरू किया। उन्होंने डॉ. नॉर्मन बोरलॉग की नव विकसित मैक्सिकन बौनी गेहूं किस्म के बारे में सीखा। इसके बाद उन्हें भारत में आमंत्रित किया। दोनों वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों को विकसित करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम किया, जिनसे अनाज की पैदावार अधिक हो। इस वैज्ञानिक सफलता में भाग लेने के अलावा, स्वामीनाथन ने भारतीय किसानों को सिखाने के लिए नए तरीके भी बनाए।
अधिक उपज देने वाली गेहूं की किस्मों, उर्वरकों और अधिक कुशल कृषि तकनीकों के संयोजन को नियोजित करके उत्पादन को प्रभावी ढंग से बढ़ाने पर जोर दिया। 1965 में, स्वामीनाथन ने भारत के उत्तरी क्षेत्र में आनुवंशिक रूप से बेहतर अनाज पैदावार पर फोकस किया। इनसे न केवल कृषि उपज में सुधार हुआ, बल्कि कृषि में वैज्ञानिक प्रगति भी शुरू हुई। किसानों के साथ स्वामीनाथन के सीधे काम किया। इससे किसानों की निरक्षरता और औपचारिक शिक्षा की कमी बाधा नहीं बनी। स्वामीनाथन ने भारतीयों की एक पीढ़ी को आधुनिक कृषि की प्रभावशीलता के बारे में ज्ञान प्रदान किया।
स्वामीनाथन के परिवार में उनकी तीन बेटियां हैं। सौम्या स्वामीनाथन एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं। दूसरी बेटी मधुरा स्वामीनाथन इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर हैं। वहीं, छोटी बेटी नित्या स्वामीनाथन इंग्लैड में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंगिला में जेंडर एनालिसिस की लेक्चरर हैं। उनकी पत्नी मीना का साल 2022 में देहांत हो गया था।
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