Karnataka CBSE ICSE Schools: कर्नाटक सरकार ने कुछ साल पहले ही राज्य भर के सभी स्कूलों में कन्नड़ को अनिवार्य विषय बना दिया है, चाहे वे किसी भी बोर्ड के हों। अब इसे लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। अब स्कूलों को कन्नड़ को पहली या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाना होगा। चलिए इसके बारे में आपको पूरी जानकारी देते हैं।

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अब ये भाषा पढ़ाना है जरूरी
सरकार द्वारा अधिसूचित नए नियमों के अनुसार सीबीएसई और आईसीएसई पाठ्यक्रम का पालन करने वाले सभी निजी स्कूलों को कन्नड़ को पहली या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाना होगा। स्कूल इसका विरोध करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, जबकि सरकार ने कर्नाटक शिक्षा संस्थान (अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करना और नियंत्रण) नियम अधिसूचित कर दिए हैं।

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किसी भी नए स्कूल या मौजूदा स्कूल को सीबीएसई या आईसीएसई से संबद्ध होने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी एनओसी अनिवार्य है। नए नियम कन्नड़ भाषा शिक्षण अधिनियम, 2015 के अनुरूप हैं, जो सभी स्कूलों में कन्नड़ को पहला या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाना अनिवार्य बनाता है।

पहले कन्नड़ को दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने की थी अनुमति

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2015 के कानून के बावजूद, स्कूल शिक्षा विभाग ने स्कूलों को कन्नड़ को दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने की अनुमति देते हुए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया।

नए नियमों ने इस 'विसंगती' को ठीक कर दिया है, लेकिन ज़्यादातर स्कूल पहले के प्रावधानों के तहत कन्नड़ को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाते हैं।

वर्ष 2015 का यह कानून सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली पहली कांग्रेस सरकार द्वारा वर्ष 2014 के ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के जवाब में बनाया गया था, जिसमें कन्नड़ या मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम मानने से मना कर दिया गया था।

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उच्च न्यायालय को दी थी चुनौती

अभिभावकों के एक समूह ने 2015 के कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है तथा इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया है। स्वतंत्र सीबीएसई स्कूल एसोसिएशन के प्रबंधन के अध्यक्ष एम श्रीनिवासन ने कहा था कि अभिभावकों ने एक याचिका दायर की है, जो अभी भी लंबित है। स्कूलों को कन्नड़ पढ़ाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन पहली भाषा के रूप में नहीं। सरकार को इसे तीन भाषाओं में से एक बनाना चाहिए और इसे स्कूलों और अभिभावकों पर छोड़ना चाहिए।

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स्कूल प्रबंधन का तर्क है कि बेंगलुरु एक महानगरीय शहर है, यहां दूसरे राज्यों से आए प्रवासी माता-पिता रहते हैं, जिनके बच्चों को कन्नड़ को पहली या दूसरी भाषा के रूप में अनिवार्य रूप से सीखने में कठिनाई होगी। आईसीएसई स्कूल के एक प्रिंसिपल ने कहा कि यह दूसरे राज्यों से आने वाले छात्रों के लिए नुकसानदेह होगा। अगर हम उन्हें अभी जबरन भाषा सिखाते हैं, तो भी उन्हें कक्षा 10 में संघर्ष करना पड़ेगा।

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हालांकि, नए नियमों को उचित ठहराते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 2015 का कानून पहले से ही प्रभावी है। अधिकारी का कहना है कि कन्नड़ भाषा शिक्षण अधिनियम के तहत, कन्नड़ को पहली या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाना पहले से ही अनिवार्य है। हमने एनओसी नियमों में संशोधन करके इसे शामिल किया है।