नई दिल्ली, अप्रैल 20। 1997 से 13 साल तक पुणे के एक दंपति ने आईटी सेक्टर में नौकरी की। मगर एक फैसले ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने कुछ अलग सोचा और आईटी सेक्टर में अपनी नौकरी छोड़ दी। फिर शुरू किया गन्ने के जूस का बिजनेस। गन्ने के जूस का बिजनेस उन्होंने ऐसे ही शुरू नहीं किया, बल्कि इसके पीछे एक लॉजिक है। दरअसल नौकरी के दौरान उन्हें ब्रेक में फैंसी कॉफी ब्रांड्स तो दिखते, मगर ऑरिजनल जूस नहीं मिलता। यही बात उनके दिमाग में हिट कर गयी और उन्हें एक नया आइडिया मिला। उन्होंने अपने बिजनेस की शुरुआत की, जिससे उनकी कमाई अब लाखों नहीं बल्कि करोड़ों में है।
हम बात कर रहे हैं मिलिंद और कीर्ति की। इस दंपति ने सालों तक आईटी सेक्टर में जॉब की। बड़े आईटी पार्क में उन्होंने काम किया, जहां ब्रेक में कैफेटेरिया में बार-बार जाना उनके लिए एक आम बात थी। इन कैफेटेरिया ने खाने और पेय कियोस्क की एक बड़ी रेंज होती। लेकिन मिलिंद को इन जगहों पर नियमित रूप से जाने पर एक बात अजीब लगी। उनकी नज़र ब्रांडेड फैंसी कॉफी पर अटक गई, जिनकी भरमार थी। जबकि इसकी तुलना में उन्होंने देखा कि जूस को यहां तवज्जो नहीं दी जाती। यहीं से उनके दिमाग में एक नये बिजनेस आइडिया की शुरुआत हुई।
मिलिंद ने देखा कि गन्ने के रस जैसे देसी जूस भी इसी समस्या जूझ रहे हैं। मिलिंद के मुताबिक गन्ने के रस का कारोबार मौसमी है और साफ-सफाई की कमी के कारण लोग लोकल शॉप से खुला जूस खरीदने में कतराते हैं। उन्होंने खुद गन्ने के जूस का कारोबार करने की सोची। उनके दिमाग में यह आइडिया 2010 में आया। उन्होंने यह आइडिया अपनी पत्नी के साथ भी डिसकस किया।
कुछ साल बाद इस दंपति ने गन्ने के जूस का स्टार्टअप 'कैनबॉट' लॉन्च करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। दोनों लोग बिजनेस में एंट्री करने के लिए सहमत थे, मगर उनके पास ऐसा करने के लिए जरूरी अनुभव और जानकारी नहीं थी। उन्होंने इसके लिए मार्केट रिसर्च और आने वाली चुनौतियों और उनसे निपटने के तरीके खोजे। उनके सामने एक मुद्दा पारंपरिक जूस निकालने की मशीन थीं, जो मुख्य रूप से लोहे से बनाई जाती हैं और धूल और अन्य प्रदूषकों से असुरक्षित होती हैं।
पारंपरिक जूस निकालने की मशीनों की बजाय उन्होंने पूरी तरह से एक नई क्रश मशीन डिजाइन करने का फैसला किया। मिलिंद का कहना है कि गन्ने की मशीन पर शोध करने, इनोवेशन और तैयार करने में उन्होंने बहुत समय बिताया। मगर इसके कई फायदे हैं। उनकी जूस निकालने की मशीन की क्रशिंग क्षमता बढ़िया है। एक बार में ये 95 फीसदी तक जूस निकाल सकती है। इसलिए गन्ने को बार-बार मशीन से नहीं गुजारना पड़ता।
समय के साथ-साथ उन्होंने विभिन्न कंपनियों में 12 आउटलेट खोले। अब वे हर महीने लगभग 45,000 ग्लास जूस बेचते हैं। जिससे उन्हें सालाना 2 करोड़ रु की कमाई होती है। उन्हें बहुत अच्छा रेस्पोंस मिला, क्योंकि बढ़िया टेस्ट और क्वालिटी के चलते लोगों ने इसे बहुत पसंद किया।
अब उनका प्लान एटीएम जूस मशीनें लगाने का है, जिससे लोगों तक आसानी से जूस पहुंचाने में मदद मिलेगी। हवाई अड्डों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी मशीनें कारगर साबित हो सकती हैं।
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