India Trade Deficit: भारत तेजी से Free Trade Agreements (FTA) के जरिए दुनिया के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत कर रहा है। सरकार का मानना है कि FTA भारतीय निर्यातकों को नए बाजार उपलब्ध कराएंगे और देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाएंगे। लेकिन Global Trade Research Initiative (GTRI) की जून 2026 की रिपोर्ट एक अलग तस्वीर दिखाती है।

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रिपोर्ट के अनुसार, जिन प्रमुख देशों और क्षेत्रों के साथ भारत ने FTA किए हैं, उनके साथ भारत का Trade Deficit लगातार बढ़ता गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या FTA वास्तव में भारत के लिए लाभदायक साबित हो रहे हैं या फिर आयात को बढ़ावा दे रहे हैं?

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भारत के FTA का मौजूदा स्टेटस

Ministry of Commerce के मुताबिक:

  • कुल 15 FTA लागू किए जा चुके हैं, जो 27 देशों के साथ व्यापार को प्रभावित करते हैं।
  • भारत के मौजूदा समय में 9 FTA operational हैं, जो 38 देशों को कवर करते हैं।
  • इसके अलावा 9 नए Trade Agreements अलग-अलग स्टेज में हैं। इनमें भारत-UK Trade Agreement भी शामिल है, जो 15 जुलाई 2026 से लागू होने जा रहा है।
  • कुल मिलाकर भारत 69 देशों के साथ FTA लागू कर चुका है या प्रोसेस में है।
  • ये देश भारत के कुल निर्यात का 75.3 प्रतिशत और कुल आयात का 65.5 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं।

ASEAN, जापान और साउथ कोरिया के साथ तेजी से बढ़ा घाटा

GTRI ने FTA लागू होने से पहले की अवधि (2007-09) और हालिया अवधि (2023-25) की तुलना की है।

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रिपोर्ट के अनुसार:

  • ASEAN देशों के साथ भारत का Trade Deficit 381% बढ़ा
  • जापान के साथ Trade Deficit 318% बढ़ा
  • साउथ कोरिया के साथ Trade Deficit 268% बढ़ा

इसके मुकाबले बाकी दुनिया के देशों के साथ भारत का Trade Deficit इसी अवधि में 142% बढ़ा।

पिछले तीन वर्षों में ASEAN, जापान और साउथ कोरिया के साथ भारत का औसत वार्षिक Trade Deficit लगभग 62 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

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FTA पार्टनर्स नए, तस्वीर वही

FY25 में UAE, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस और EFTA देशों (स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टाइन) को भारत ने कुल 48.6 अरब डॉलर का निर्यात किया। हालांकि इन्हीं देशों से भारत का आयात लगभग 100 अरब डॉलर रहा। इसका नतीजा 50 अरब डॉलर से ज़्यादा के Trade Deficit के रूप में सामने आया।

GTRI का मानना है कि आने वाले सालों में जैसे-जैसे टैरिफ और कम होंगे, आयात और बढ़ सकता है, जिससे व्यापार घाटा और गहरा हो सकता है।

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भारत के कुल व्यापार में FTA की हिस्सेदारी

भारत के 15 लागू FTA, जो 27 देशों को कवर करते हैं, देश के कुल:

  • Export: 28.5%
  • Import: 32.2%

2012 से पहले के 10 पुराने FTA

  • निर्यात में हिस्सेदारी: 16.6%
  • आयात में हिस्सेदारी: 18%
  • 2020 के बाद हुए 5 नए FTA
  • निर्यात में हिस्सेदारी: 11.9%
  • आयात में हिस्सेदारी: 14.1%

वहीं 42 देशों के साथ प्रस्तावित 9 नए FTA भविष्य में भारत के निर्यात का 46.8% और आयात का 33.3% हिस्सा कवर कर सकते हैं।

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FTA के बावजूद Trade Deficit क्यों बढ़ रहा है?

GTRI ने इसके पीछे तीन प्रमुख कारण बताए हैं।

1. Tariff Structure में असमानता

भारत का औसत Most Favoured Nation (MFN) Tariff लगभग 12.6% है और कुछ उत्पादों पर यह 150% तक पहुंच जाता है।

दूसरी ओर सिंगापुर का औसत MFN Tariff लगभग शून्य है, जबकि जापान, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और UAE जैसे देशों में यह 4% से भी कम है।

ऐसे में जब भारत FTA के तहत टैरिफ घटाता है, तो विदेशी उत्पाद भारतीय बाजार में काफी सस्ते हो जाते हैं। लेकिन भारतीय निर्यातकों को दूसरी तरफ उतना अतिरिक्त लाभ नहीं मिल पाता।

2. Inverted Duty Structure

भारत में कई मामलों में कच्चे माल और इनपुट पर अधिक ड्यूटी लगती है, जबकि तैयार माल FTA के तहत कम या शून्य शुल्क पर आयात हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर स्टील और एल्युमीनियम जैसे इनपुट पर 7.5% से 10% तक ड्यूटी है, जबकि इनसे बने कई तैयार उत्पाद FTA के कारण ड्यूटी-फ्री भारत में प्रवेश कर जाते हैं।

इससे घरेलू मैन्युफैक्चरर्स की लागत बढ़ जाती है और विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है।

3. FTA का कम उपयोग

रिपोर्ट के अनुसार भारत के केवल 20% से 30% निर्यातक ही FTA का पूरा लाभ उठा पा रहे हैं।

इसके विपरीत कई विदेशी देशों में FTA Utilisation Rate 60% से 70% तक पहुंच जाता है।

यानी भारतीय कंपनियां उन व्यापारिक सुविधाओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रही हैं, जिनके लिए ये समझौते किए गए थे।

आगे की राह क्या है?

GTRI का मानना है कि केवल टैरिफ कम करने से Trade Balance नहीं होगा।

भारत को FTA का वास्तविक फायदा चाहिए, तो घरेलू उद्योगों की Competition Capacity बढ़ानी होगी, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करना होगा और इनपुट लागत को कम करना होगा।

भारत आने वाले सालों में UK, EU और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों के साथ भी व्यापार समझौतों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि नए FTA केवल आयात नहीं बढ़ाएं, बल्कि भारतीय निर्यात और घरेलू उद्योग को भी सच में फायदा पहुंचाएं।