E20 Fuel: आज अगर मैं आपसे पूछूं कि आपकी कार में जो पेट्रोल डल रहा है... क्या वो सच में 100 प्रतिशत पेट्रोल है? शायद आपका जवाब होगा... हां। लेकिन सच्चाई ये है कि अब भारत में मिलने वाला ज्यादातर पेट्रोल पहले जैसा नहीं रहा। उसमें धीरे-धीरे इथेनॉल मिलाया जा रहा है। आपने पेट्रोल पंप पर E20 लिखा जरूर देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि इसका मतलब क्या है? क्या ये सिर्फ एक नया फ्यूल है... या फिर भारत की सबसे बड़ी एनर्जी पॉलिसी का हिस्सा?

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सरकार कहती है कि इससे देश के अरबों डॉलर बचेंगे, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण कम होगा। लेकिन दूसरी तरफ कई लोग दावा करते हैं कि E20 आने के बाद उनकी गाड़ी का माइलेज कम हो गया है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 3000 लीटर पानी लगता है। अगर ऐसा है... तो क्या हम पेट्रोल बचाने के चक्कर में पानी गंवा रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल... क्या आने वाले समय में भारत की सड़कें 100 प्रतिशत इथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियों से भर जाएंगी?

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इथेनॉल है क्या-

आसान भाषा में कहें तो इथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, लेकिन ये पीने वाला अल्कोहल नहीं है। इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री और फ्यूल बनाने के लिए किया जाता है। इसे गन्ने, मक्के और कुछ दूसरे कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। यानी जो फसल पहले सिर्फ चीनी बनाने के काम आती थी, अब वही आपकी कार चलाने का काम भी कर रही है।

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इथेनॉल बनने की प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प है। पहले गन्ने या मक्के से शुगर निकाली जाती है। फिर उसमें यीस्ट मिलाकर फर्मेंटेशन कराया जाता है, जिससे अल्कोहल बनता है। इसके बाद डिस्टिलेशन की प्रक्रिया से उसे शुद्ध किया जाता है और आखिर में वही इथेनॉल पेट्रोल के साथ मिलाकर E10, E20, E85 या E100 जैसे फ्यूल तैयार किए जाते हैं।

अब सवाल है कि E20 नाम क्यों? इसका जवाब बहुत आसान है। E का मतलब है Ethanol और 20 का मतलब है कि उस फ्यूल में 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल है। इसी तरह E10 में 10 प्रतिशत, E85 में 85 प्रतिशत और E100 में सिर्फ इथेनॉल होता है।

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लेकिन सरकार आखिर ऐसा क्यों कर रही है?

इसकी सबसे बड़ी वजह है भारत का कच्चे तेल पर निर्भर होना। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत Crude Oil विदेशों से खरीदता है। इसके लिए हर साल भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है। अगर पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिल जाए तो उतनी ही मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत कम होगी। यानी आयात घटेगा, डॉलर की बचत होगी और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

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सरकार का दूसरा बड़ा तर्क किसानों से जुड़ा है। जून 2026 तक सरकार के अनुसार गन्ना और मक्का किसानों को इथेनॉल सप्लाई चेन के जरिए करीब 1.58 लाख करोड़ रुपये की आय मिल चुकी है। पहले अतिरिक्त गन्ना सिर्फ चीनी मिलों के लिए समस्या बन जाता था, लेकिन अब उसी गन्ने से इथेनॉल बन रहा है। इससे शुगर मिलों को नया बाजार मिला और किसानों को भुगतान की संभावनाएं भी बेहतर हुईं।

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तीसरा कारण पर्यावरण है। सरकार का कहना है कि पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल मिश्रित ईंधन से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। यानी अगर सही तरीके से इसका इस्तेमाल हो तो यह पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में अपेक्षाकृत साफ ईंधन साबित हो सकता है। अब तक सब कुछ अच्छा लग रहा है। देश का फायदा... किसानों का फायदा... प्रदूषण कम... और तेल का आयात भी कम है। लेकिन अगर कहानी इतनी ही आसान होती, तो E20 को लेकर इतना विवाद क्यों होता?

असल सवाल यहीं से शुरू होता है:

अगर इथेनॉल इतना अच्छा है... तो हजारों लोग माइलेज कम होने की शिकायत क्यों कर रहे हैं? आखिर क्यों कुछ लोग कह रहे हैं कि पहले जो गाड़ी 20 किलोमीटर चलती थी, अब वही कम दूरी तय कर रही है? और क्या सचमुच एक लीटर इथेनॉल बनाने के लिए करीब 3000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है?यहीं से इस कहानी का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है... क्योंकि अब हम बात करेंगे उन सवालों की, जिन पर आज पूरे देश में सबसे ज्यादा बहस हो रही है।

अब असली बहस यहीं से शुरू होती है... कि अगर E20 Fuel इतना फायदेमंद है, तो फिर लोगों की शिकायतें इतनी ज्यादा क्यों हैं?

सबसे पहले बात करते हैं माइलेज की:

पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल में ऊर्जा यानी एनर्जी कंटेंट थोड़ा कम होता है। इसका सीधा मतलब ये है कि समान मात्रा में E20 Fuel, शुद्ध पेट्रोल की तुलना में थोड़ी कम दूरी तय कर सकता है। सरकार का दावा है कि यह कमी लगभग 2 से 6 प्रतिशत के बीच होती है। लेकिन कई उपयोगकर्ताओं का अनुभव इससे अलग है। कुछ लोगों का कहना है कि उनकी गाड़ियों में माइलेज में ज्यादा गिरावट महसूस हुई है। हालांकि यहां एक बात समझना जरूरी है कि माइलेज सिर्फ फ्यूल पर निर्भर नहीं करता। गाड़ी की कंडीशन, ड्राइविंग स्टाइल, ट्रैफिक और मेंटेनेंस भी इसमें बड़ा रोल निभाते हैं।

अब सवाल उठता है E85 और E100 का:

E85 का मतलब है ऐसा फ्यूल जिसमें 85 प्रतिशत इथेनॉल होता है और सिर्फ 15 प्रतिशत पेट्रोल। हाल ही में भारत में Flex Fuel Vehicles पर काम शुरू हुआ है, जैसे कुछ दोपहिया और कार मॉडल जो अलग-अलग इथेनॉल प्रतिशत पर चल सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि भारत में अभी ज्यादातर गाड़ियां E20 के हिसाब से भी पूरी तरह डिज़ाइन नहीं हुई हैं, ऐसे में E85 या E100 का इस्तेमाल फिलहाल सीमित है।

E100 यानी 100 प्रतिशत इथेनॉल की बात करें तो यह भविष्य की दिशा जरूर है, लेकिन इसके लिए पूरी गाड़ियों, इंजन टेक्नोलॉजी और फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर को बदलना होगा। यह एक लंबी प्रक्रिया है।

अब आते हैं सबसे विवादित मुद्दे पर...पानी-

एक रिपोर्ट के अनुसार, 1 लीटर इथेनॉल बनाने में लगभग 3000 लीटर पानी लग सकता है, खासकर जब यह गन्ने से तैयार किया जाए। वहीं मक्के से बनने वाले इथेनॉल में पानी की खपत थोड़ी कम होती है। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह पानी सीधे इथेनॉल में नहीं जाता, बल्कि पूरी कृषि और प्रोसेसिंग सिस्टम में इस्तेमाल होता है। भारत जैसे देश में जहां पहले से ही कई राज्यों में Groundwater Level गिर रहा है, वहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन भविष्य में पानी की समस्या को और बढ़ा सकता है?

अब सरकार का पक्ष भी समझना जरूरी है:

सरकार का मानना है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से देश की Crude Oil पर निर्भरता कम हो रही है, जिससे हर साल अरबों डॉलर की बचत हो रही है। इसके अलावा किसानों को भी उनकी फसल का बेहतर दाम मिल रहा है। शुगर मिल्स के लिए यह एक नया रेवेन्यू मॉडल बन चुका है। कुछ बड़ी कंपनियां जैसे Balrampur Chini, Triveni Engineering, Dalmia Bharat Sugar और अन्य कंपनियां इस सेक्टर में तेजी से विस्तार कर रही हैं।

लेकिन हर बदलाव के साथ चुनौतियां भी आती हैं:

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की मौजूदा गाड़ियां इस बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं? क्योंकि अभी देश में लाखों पुरानी गाड़ियां चल रही हैं, जो न तो पूरी तरह E20 के लिए डिजाइन की गई थीं और न ही E85 या E100 के लिए। इसके अलावा इंजन के कुछ पार्ट्स जैसे रबर सील्स, फ्यूल लाइन्स और मेटल कंपोनेंट्स पर इथेनॉल का असर लंबे समय में देखा जा सकता है, क्योंकि इथेनॉल नमी को आकर्षित करता है।

अब अगर पूरे सिस्टम को एक नजर से देखें तो तस्वीर काफी दिलचस्प बनती है। एक तरफ हैं देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और इंपोर्ट बिल की बचत। दूसरी तरफ हैं माइलेज की चिंता, इंजन कम्पैटिबिलिटी और पानी जैसे संसाधनों पर दबाव। यानी यह सिर्फ एक फ्यूल का बदलाव नहीं है... यह भारत की पूरी एनर्जी स्ट्रेटजी का ट्रांजिशन है। और हर ट्रांजिशन की तरह इसमें भी फायदे हैं और सवाल भी।

अब सबसे बड़ा सवाल आपसे है: क्या E20 Fuel भारत के लिए एक जरूरी कदम है... जो हमें Oil Import से आजादी दिला सकता है? या फिर यह एक ऐसा प्रयोग है, जो आने वाले समय में पानी और इंजन टेक्नोलॉजी जैसी नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है? जवाब अभी पूरी तरह तय नहीं है लेकिन इतना तय है कि भारत अब पुराने पेट्रोल युग से धीरे-धीरे एक नए फ्यूल युग में कदम रख चुका है।