नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उन नये तीन कृषि कानूनों पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिनका लाखों किसान विरोध कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक तीनों कृषि कानूनों को लागू करने पर रोक लगाई है। अपने इस आदेश का ऐलान करते हुए शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि बातचीत के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आज शुरू में कहा कि वह नए कृषि कानूनों को निलंबित करने की योजना बना रहा है, लेकिन अनिश्चित काल के लिए नहीं। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) शरद अरविंद बोबड़े ने कहा कि शीर्ष न्यायालय तीन कृषि कानूनों को सही से जानने के लिए एक समिति भी बना रहा है।
केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए तीन कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता पर सीजेआई की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ सुनवाई कर रही थी। इस मामले पर द्रमुक सांसद तिरूचि शिवा, राजद सांसद मनोज के झा सहित कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शनकारी किसानों को तितर-बितर करने के लिए भी याचिका दाखिल की गई थी।
सीजेआई ने कहा कि हम एक समिति का गठन कर रहे हैं ताकि हमारे पास एक स्पष्ट तस्वीर हो। हम समस्या को हल करना चाह रहे हैं। किसानों से कोर्ट ने कहा कि यदि आप अनिश्चितकालीन आंदोलन करना चाहते हैं, तो आप ऐसा कर सकते हैं। अदालत ने कानूनों की वैधता, विरोध से प्रभावित नागरिकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा पर चिंता जताई। कोर्ट ने अपने पास मौजूद शक्तियों के अनुसार समस्या को हल करने की कोशिश करने की बात कही। शक्तियों के आधार पर ही अदालत ने कानून को निलंबित कर समिति बनाई है।
कृषि कानूनों को चुनौती देने वाली याचिका दायर करने वाले एडवोकेट एमएल शर्मा ने शीर्ष अदालत को बताया कि किसानों ने कहा है कि वे अदालत द्वारा गठित की जाने वाली किसी भी समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे। मगर कोर्ट ने कहा कि हम यह तर्क नहीं सुनना चाहते कि किसान समिति के पास नहीं जाएंगे। शर्मा ने किसानों की तरफ से कहा कि कई लोग चर्चा के लिए आए थे, लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया।
सीजेआई ने कहा कि हम प्रधानमंत्री को किसानों के पास जाने के लिए नहीं कह सकते। वह इस मामले में पक्षकार नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों से सहयोग मांगा और कहा कि कोई भी शक्ति विवादास्पद कृषि कानूनों पर गतिरोध को हल करने के लिए समिति गठित करने से नहीं रोक सकती है। शीर्ष अदालत के पास समस्या को हल करने के लिए कानून को निलंबित करने की शक्तियां हैं।
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