Basant Panchami Nizamuddin Dargah: बसंत पंचमी इस साल 23 जनवरी शुक्रवार के दिन मनाई जा रही है। इस दिन पूरा उत्तर भारत पीले रंग में डूबा रहेगा। भारत को गंगा जमनी तहजीब वाला देश भी कहा जाता है जहां हिन्दू-मुस्लिम मिलकर एक साथ त्योहारों को खुशी से मनाते हैं।

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इसी की एक मिसाल दिल्ली में मौजूद हजरत निजामुद्दीन (Hazrat Nizamuddin)औलिया की दरगाह में देखने को मिलती है जहां बड़े ही धूमधाम से बसंत पंचमी के त्योहार को मनाया जाता है। बसंत पंचमी (Basant Panchami 2026) का त्योहार दरगाह निजामुद्दीन में करीब 700 साल से बनाया जा रहा है।

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दरगाह पर बसंत पंचमी के त्योहार बनाने के पीछे की कहानी एक गुरु और शिष्य के प्यार से शुरू हुई थी, जोकि उनके दुनिया से जाने के बाद भी उनके मानने वाले बड़े ही धूमधाम से मनाते चले आ रहे हैं।

इस तरह मनाते हैं दरगाह पर बसंत पंचमी

दरगाह पर बसंत पंचमी के इंतजाम के लिए पूरी दरगाह को पीले रंग में रंग दिया जाता है। इस दिन दरगाह में खिदमत करने वाले खादिम पीले रंग के कपड़े पहनते हैं और दरगाह पर पीले रंग की चादर के साथ सरसों के फूल लेकर चढ़ाते हैं। वहीं, दरगाह में महफ़िल-ए-शमा और कव्वाली के प्रोग्राम का भी इंतजाम किया जाता है। दरगाह पर आने वाले जायरिन भी पीले कपड़े पहनकर आते हैं और पीली चादर को दरगाह पर पेश करते हैं।

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कुछ इस तरह शुरू हुई थी दरगाह पर बसंत पंचमी मनाने की शुरुआत

14वीं शताब्दी में हजरत निजामुद्दीन के भांजे की मौत हो गई थी जिनसे हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही बहुत ज्यादा प्यार किया करते थे, उनके इस दुनिया से जाने के बाद निजामुद्दीन औलिया को बहुत सदमा हुआ जिस वजह से उन्होंने लोगों से मिलने बंद कर दिया था और बिल्कुल शांति वाली जगह पर जाकर बैठ गए थे।

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हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य (मुरीद) महान कवि और संगीतकार हजरत अमीर खुसरो से अपने गुरु की ये उदासी देखी नहीं जा रही थी। एक बार हजरत अमीर खुसरो का एक मंदिर के सामने से गुजर हो रहा था जहां उन्होंने देखा कुछ महिलाएं पीले कपड़े पहने हुए और हाथों में सरसों के फूल लेकर मंदिर की तरफ गीत गाती हुई जा रही थी, तभी अमीर खुसरो ने उनसे पूछा आप लोग ये सब लेकर कहां जा रही हो तब उन महिलाओं ने कहा आज बसंत पंचमी है, हम अपनी देवी को मनाने के लिए जा रहे हैं ये बात सुनकर अमीर खुसरो ने भी ठीक वैसा ही करना सोचा जिसमें उन्होंने पीले कपड़े पहने और अपने गले में ढोलक डाली सरसों के फूल लेकर लेकर अपने गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया की बारगाह में गीत गाते हुए पेश हुए, जहां उनके गुरु ने अपने शिष्य को एक नए अंदाज में देखा जोकि बहुत खुश और उन्हें अपने गले से लगा लिया, जिसके बाद से आज तक बसंत पंचमी का त्योहार दरगाह हजरत निजामुद्दीन औलिया में मनाते चले आ रहे हैं।

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क्या है बसंत पंचमी की अहमियत?

देवी सरस्वती को समर्पित बसंत पंचमी की पूजा इस साल शुक्रवार के दिन कि जा रही है। बसंत पंचमी को श्री पञ्चमी और सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। माता सरस्वती को कला, ज्ञान, संगीत, और विज्ञान की देवी माना जाता है। जिस दिन पञ्चमी तिथि सूर्योदय और दोपहर के बीच में व्याप्त रहती है, उस दिन को सरस्वती पूजा के लिये उत्तम माना जाता है। ऐसे में इस साल 23 जनवरी के दिन बसंत पंचमी का त्योहार उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।