नयी दिल्ली। परेशान चल रही वोडाफोन आइडिया के सामने एक और समस्या आ गयी है। दरअसल वोडाफोन आइडिया इंडस टावर्स में अपनी हिस्सेदारी नहीं बेच सकेगी। इसके लिए कंपनी को एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) से मंजूरी लेनी होगी। वोडाफोन पर करीब 50000 करोड़ रुपये का बकाया एजीआर है। कंपनी की योजना इंडस टावर्स में हिस्सेदारी बेच कर पैसे जुटाने की थी, जिनका इस्तेमाल एजीआर चुकाने में होता। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक टेलीकॉम कंपनियों को 17 मार्च तक एजीआर का बकाया चुकाना है। वहीं बात इंडस टावर्स की करें तो इसका भारती इन्फ्राटेल के साथ विलय होना है। इस विलय सौदे में ही वोडाफोन आइडिया को इंडस टावर्स में अपनी हिस्सेदारी बेचनी थी।
इंडस टावर्स में वोडाफोन की 11.5 फीसदी हिस्सेदारी है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इंडस्ट्री विश्लेशकों जानकारों का कहना है कि इसे बेचने के लिए वोडाफोन को एनसीएलटी मंजूरी लेनी पड़ेगी। इतना ही नहीं इसके बाद रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की भी मंजूरी जरूरी होगी। इसमें 2-3 महीनों का समय लग सकता है। जबकि दूरसंचार विभाग की तरफ से बीते शुक्रवार को मंजूरी मिलने के बाद उम्मीद थी कि भारती इंफ्राटेल-इंडस टावर्स का विलय दो हफ्तों में हो जायेगा। बता दें कि इस सौदे से वोडाफोन को 4500 करोड़ रुपये मिल सकते हैं।
वोडाफोन आइडिया के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला बीते मंगलवार को वोडाफोन की बैंक गारंटी को भुनाये जाने पर अपनी चिंता साझा करने के लिए दूरसंचार सचिव अंशु प्रकाश और इसके अगले दिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मिले थे। सरकार की तरफ से वोडाफोन आइडिया की बैंक गारंटी न भुनाये जाने के संकेत दिये गये थे। हालांकि इसके बाद अलग-अलग विभागों के सरकारी अधिकारियों की बैठक में टेलीकॉम कंपनियों को एजीआर के जुर्माने और ब्याज में राहत देने पर सहमति नहीं बन पायी।
भारती इंफ्राटेल और इंडस टावर्स के विलय का ऐलान करीब 2 साल पहले अप्रैल 2018 में किया गया था। मगर ये कंपनियां दूरसंचार विभाग की मंजूरी के इंतेजार में थीं। अब दूरसंचार विभाग से मंजूरी मिलने के बाद एनसीएलटी और रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की मंजूरी की भी जरूरत पड़ेगी। भारती इंफ्राटेल और इंडस टावर्स के विलय से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी टावर कंपनी बनेगी। संयुक्त इकाई 163,000 से अधिक टावरों का मालिक होगी, जो चीन टावर के बाद दूसरी सबसे बड़ी कंपनी होगी।
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