US-Iran war: ईरान में सुप्रीम लीडर के निधन के बाद राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल रही है। देश में शासन की निरंतरता बनाए रखने के लिए अंतरिम लीडरशिप काउंसिल को सक्रिय किया गया है।

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सरकारी समाचार एजेंसी ISNA के अनुसार, अलीरेजा अराफी को इस काउंसिल में ज्यूरिस्ट यानी कानूनी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब देश को स्थिर और संतुलित नेतृत्व की जरूरत है।

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अंतरिम व्यवस्था कैसे काम करती है?

ईरान के कानून के मुताबिक, अगर सुप्रीम लीडर का पद खाली हो जाता है तो अस्थायी रूप से एक विशेष काउंसिल जिम्मेदारी संभालती है। यह काउंसिल देश के सर्वोच्च पद से जुड़े सभी जरूरी काम देखती है। जब तक Assembly of Experts नए सुप्रीम लीडर का चुनाव नहीं कर लेती, तब तक यही व्यवस्था लागू रहती है। इसका मकसद यह तय करना है कि सरकार के फैसलों और प्रशासनिक कामों में कोई रुकावट न आए।

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कौन-कौन हैं काउंसिल में?

अलीरेजा अराफी को कानूनी मामलों का प्रतिनिधि बनाकर शामिल किया गया है। उनके साथ राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और न्यायपालिका प्रमुख गुलाम-होसैन मोहसेनी-एजेई भी इस अंतरिम टीम का हिस्सा हैं। ये तीनों मिलकर सुप्रीम लीडर की भूमिका निभाएंगे और जरूरी फैसले लेंगे।

अराफी को धार्मिक और कानूनी क्षेत्र में अनुभव रखने वाला चेहरा माना जाता है, इसलिए उनकी नियुक्ति को संतुलित कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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देश और दुनिया की नजर

सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद देश में नई बहस शुरू हो गई है। जनता यह जानना चाहती है कि अगला सर्वोच्च नेता कौन होगा। वहीं राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव को ईरान की राजनीति का अहम मोड़ बता रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है। रूसी समाचार एजेंसी TASS की रिपोर्ट के अनुसार, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं वैश्विक नियमों और मानवीय मूल्यों के खिलाफ हैं। उन्होंने ईरान के प्रति संवेदना व्यक्त की।

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आगे क्या होगा?

अब अगला कदम असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स का है, जो नए सुप्रीम लीडर का चयन करेगी। इस प्रक्रिया में समय लग सकता है, लेकिन तब तक अंतरिम काउंसिल देश की जिम्मेदारी संभाले रहेगी।

यह समय ईरान के लिए बेहद संवेदनशील है। आने वाले फैसले देश की आंतरिक नीति, विदेश संबंधों और सुरक्षा रणनीति पर असर डाल सकते हैं। फिलहाल प्राथमिकता यही है कि शासन सुचारु रूप से चलता रहे और देश में स्थिरता बनी रहे।

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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ पद का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला क्षण भी साबित हो सकता है।