America's H1B Vs China's K Visa: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले सप्ताह के आखिर में यानी शुक्रवार, 19 सितंबर को एक बड़ा फैसला लेते हुए H1-B वीज़ा की फीस में भारी बढ़ोतरी का ऐलान किया। इस एलान ने पूरा अमेरिका और भारत समेत कई देशों की टेक कंपनियों को हिलाकर रख दिया। दरअसल, ट्रम्प H1-B वीज़ा की फीस लगभग 50 गुना बढ़ाकर 1,00,000 डॉलर कर दिया, जिसके बाद भारत समेत पूरे अमेरिका में तुरंत अफरा-तफरी मच गई।

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इस फैसले के बाद सिलिकॉन वैली की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को देश न छोड़ने की चेतावनी दी। हालांकि, मामला बिगड़ता देख 20 सितंबर को राष्ट्रपति भवन व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि यह फीस बढ़ोतरी केवल नए आवेदनों पर लागू होगी और यह एकमुश्त शुल्क होगा। हालांकि, इस बयान के बाद बेशक मामला ठंडा हो गया लेकिन फिर भी, H-1B कार्यक्रम का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। कर्मचारियों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह वीज़ा अभी भी जोखिम उठाने लायक है।

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चूंकि अमेरिका में हर साल हजारों की संख्या में भारतीय और चीनी नागरिक H1B वीजा लेकर काम के लिए जाते हैं। ऐसे में फीस बढ़ोतरी से हजारों कामगारों पर इसका असर पड़ेगा जो अमेरिका जाकर नौकरी करना चाहते हैं और उन तमाम कंपनियों पर पड़ने वाला है जो ऐसे कर्मचारियों को हायर करते रहे हैं।

हालांकि, इसी अनिश्चितता के बीच चीन ने अवसर का फायदा उठाते हुए अपने नए K वीज़ा के साथ कदम रख दिया है, जो 1 अक्टूबर, 2025 को लॉन्च होने वाला है। चीन ने उन तमाम लोगों से जो अमेरिका में नौकरी कर रहे हैं और H1B वीजा के चलते उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें अपने यहां K Visa पर आमंत्रित किया है। ऐसे में अब सवाल है कि विदेशी श्रमिकों के लिए अमेरिका का H1B Visa या चीन का K Visa ज्यादा फायदेमंद है। साथ ही वीजा से उपजे विमर्श का भारत,चीन और अमेरिका के लिए क्या मायने है... आइए समझते हैं कि नए नियम भारतीय और चीनी कर्मचारियों और अमेरिकी उद्योगों को कैसे प्रभावित करेंगे।

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H1B वीजा फीस बढ़ोतरी से भारत और अमेरिका को कितना नुकसान?

भारत के 283 अरब डॉलर के आईटी क्षेत्र पर इसका बुरा असर पड़ने की संभावना है। आईटी सेक्टर से जुड़े एक्सपर्ट्स और इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि यह कदम अमेरिकी परियोजनाओं में कुशल प्रतिभाओं को घुमाने की लंबे समय से चली आ रही प्रथा को बाधित करेगा।

रॉयटर्स के अनुसार, आईटी सेक्टर अपने राजस्व का लगभग 57% संयुक्त राज्य अमेरिका से अर्जित करता है और वर्षों से कार्य वीज़ा कार्यक्रमों और आउटसोर्सिंग से लाभान्वित होता रहा है, लेकिन अब ये बदलाव Apple, JPMorgan Chase, Walmart, Microsoft, Meta और Alphabet के Google जैसे ग्राहकों वाली IT कंपनियों को ऑनशोर रोटेशन रोकने, ऑफशोर डिलीवरी में तेज़ी लाने और अमेरिकी नागरिकों की भर्ती बढ़ाने के लिए मजबूर करेंगे।

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एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत या चीन पर इसका तत्काल प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका में इसके प्रभाव और भी दूरगामी हो सकते हैं। BBC के अनुसार, TCS और Infosys जैसी भारतीय आउटसोर्सिंग दिग्गज कंपनियों ने स्थानीय कार्यबल का निर्माण करके और डिलीवरी को विदेश में स्थानांतरित करके इसके लिए लंबे समय से तैयारी की है।

विश्लेषकों का कहना है कि शुल्क वृद्धि अमेरिकी कंपनियों को अपनी नियुक्ति नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करने और अपने काम का एक बड़ा हिस्सा विदेश भेजने पर मजबूर करेगी, जिससे अंततः अमेरिकी इनोवेशन और प्रतिस्पर्धात्मकता कमज़ोर पड़ जाएगी। इसके अलावा, अब भारत और चीन जैसे देशों से ज़्यादा लोग अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के लिए दूसरे देशों का रुख करेंगे, जिसका अमेरिकी विश्वविद्यालय प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ेगा।

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अमेरिकी H-1B की विशेषताएं

H-1B वीज़ा विदेशी पेशेवरों के लिए विशिष्ट क्षेत्रों, विशेष रूप से STEM में काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान H-1B धारकों में से 70% से अधिक भारतीय नागरिक हैं। एच-1बी वीजा एक गैर-प्रवासी वीजा है। यह आमतौर पर उन्हें मिलता है, जो अमेरिका में काम करने जाते हैं। इसके बाद उसे ग्रीन कार्ड दिया जाता है। एच-1बी वीजा की वैलिडिटी अभी छह साल है।

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1990 में शुरू किया गया H-1B वीज़ा अमेरिकी इमिग्रेशन प्रोग्राम्स का अहम हिस्सा है। इसे खासकर टेक सेक्टर के लिए बनाया गया था ताकि विज्ञान, गणित और कंप्यूटर के क्षेत्र में स्किल गैप को पूरा किया जा सके। 2023 में जारी H-1B वीज़ाओं में करीब 65% कंप्यूटर-संबंधित नौकरियों के लिए थे। हर साल 65,000 नई एंट्रीज़ के साथ 20,000 सीटें अमेरिकी मास्टर्स डिग्री या उससे ऊपर की योग्यता वाले उम्मीदवारों के लिए रिज़र्व रहती हैं। 2025 वित्तीय वर्ष में 4.7 लाख से ज़्यादा योग्य एंट्रीज़ आईं, जबकि उपलब्ध सीटें सिर्फ 85,000 थीं।

चीन का नया K वीज़ा (China New K Visa)

बीजिंग वैश्विक प्रतिभाओं के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान कर रहा है। अगस्त में, चीन की राज्य परिषद ने K वीज़ा श्रेणी का अनावरण किया, जो वर्षों में पेश किया गया पहला नया वीज़ा प्रकार है। न्याय मंत्रालय के अनुसार, यह वीज़ा चीन या विदेश में मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों या शोध संस्थानों से STEM क्षेत्रों में स्नातक या उच्चतर डिग्री वाले विदेशी युवाओं को टारगेट करता है।

चीन के मौजूदा 12 प्रकार के वीज़ा की तुलना में, इसमें एक से ज़्यादा प्रविष्टियां, लंबी वैधता और लंबे प्रवास की सुविधा है। पात्रता शिक्षा, अनुसंधान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संस्कृति और उद्यमशीलता के क्षेत्रों में कार्यरत लोगों तक भी फैली हुई है। आवेदकों को योग्यता का प्रमाण और पेशेवर या शोध कार्य में संलग्नता का प्रमाण देना होगा। बीजिंग को उम्मीद है कि K वीज़ा वैश्विक STEM स्नातकों और पेशेवरों को आकर्षित करेगा, जो अब अमेरिका के बारे में दो बार सोच सकते हैं।

आव्रजन सलाहकारों का कहना है कि हालांकि H-1B अभी भी एक अमेरिकी तकनीकी करियर और संभावित दीर्घकालिक निवास की प्रतिष्ठा प्रदान करता है, लेकिन वित्तीय और राजनीतिक जोखिम बढ़ गए हैं। इसके विपरीत, K वीज़ा शैक्षणिक और व्यावसायिक आदान-प्रदान को प्राथमिकता देता है, जिससे कुशल प्रतिभाओं के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा में चीन को एक नई बढ़त मिल सकती है।