नई दिल्ली, जून 21। राज्य एवं केंद्रीय करों एवं लेवी (आरओएससीटीएल) योजना में छूट की नई शर्तों के कारण देश के गारमेंट निर्यातकों को 1,200 करोड़ रुपये का संभावित नुकसान हो सकता है। यह योजना निर्यातकों द्वारा इनपुट पर पहले से भुगतान किए गए करों और लेवी के लिए छूट प्रदान करती है। अब सरकार ने इस छूट को उन शेयरो में बदल दिया है जो ट्रेड (बेचने-खरीदने) के योग्य होंगे। निर्यातक इन शेयरों को आयातकों को बेच सकेंगे। शेयरों का उपयोग नकद भुगतान के विकल्प के रूप में किया जा सकेगा।
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक जानकारों के अनुसार सरकार व्यापार परिधान निर्यातकों के मार्जिन पर ऐसे समय में दबाव डाल रही है जब वे फंड की भारी कमी की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। परिधान निर्यात संवर्धन परिषद के सदस्य और गारमेंट एक्सपोर्टर्स एंड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (जीईएमए) के अध्यक्ष विजय जिंदल का कहना है शेयरों में ट्रेड की इस छूट से सिर्फ आयातकों को फायदा होगा। वे निर्यातकों से शेयरों की तय की गई कीमत पर अनुचित लाभ उठा रहे हैं।
गारमेंट भारत के कुल कपड़ा निर्यात में 36 फीसदी का योगदान देता है। देश सालाना 44 अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात करता है, जिसमें से 16 अरब डॉलर की हिस्सेदारी गारमेंट की है। टैक्स को शेयरों में बदलने की योजना के तहत निर्यातकों पर निर्यात शुल्क का कुल 5 प्रतिशत का भुगतान है, जिसकी वैल्यू लगभग 6000 करोड़ रु के बराबर है। भुगतान में 20 फीसदी की छूट निर्यातकों पर प्रत्यक्ष रूप से 1200 करोड़ रु का प्रभाव डालेगी।
जानकारों का कहना है कि कपड़ा उद्योग लगभग 4.5 करोड़ श्रमिकों को रोजगार देता है और 2029 तक इसकी वैल्यू 209 अरब डॉलर से भी अधिक होने की उम्मीद है। लेकिन अगर इस तरह की समस्याएं जारी रहती हैं, तो कपड़ा व्यापार में बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देश भारत से तेजी से आगे निकल सकते हैं। इससे भारत इस क्षेत्र में अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धा खो देगा। इन देशों में श्रम लागत बहुत कम है।
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