तमाम लोग बचत के लिए निवेश का रास्ता अपनाते हैं। कुछ योजनाएं होती हैं जिसके तहत लोग तमाम निवेश योजनाओं में पैसे लगाते हैं। इसी में एक है आवर्ती निवेश जिसे आम भाषा में RD भी कहा जाता है। बैंक या पोस्ट ऑफिस में निवेश के अलावा लोग RD जमा में भी निवेश करते हैं लेकिन शायद कुछ ही लोगों को पता हो कि RD से होने वाली आय पर टैक्स देना पड़ता है।
RD निवेश में व्यक्ति हर महीने एक फिक्स निवेश करता है साथ ही उससे मिलने वाले ब्याज का भी लाभ उठाता है। RD यानि रिकरिंग डिपॉजिट अगर कोई व्यक्ति सालाना 10 हजार रुपए से अधिक आय का लाभ लेता है तो बैंक 10 प्रतिशत की दर से टीडीएस काटता है। इससे पहले ये नियम सिर्फ फिक्स डिपॉजिट पर लगता था। जून 2015 से इस नियम में परिवर्तन किया गया और रिकरिंग डिपॉजिट टीडीएस काटने का प्रवाधान किया गया।
अगर आप चाहते हैं कि आपको रिकरिंग डिपॉजिट से हुए लाभ का टीडीएस ना देना पड़े तो आपको इसके लिए फॉर्म 15G भरना पड़ेगा। ये फॉर्म फिक्स डिपॉजिट के लिए भी प्रयोग में लाया जा सकता है। हां, इसमें इस बात का ध्यान रहे कि आप कर के दायरे में ना आ रहे हों।
तमाम निवेशकों को लगता है कि अगर वह रिकरिंग डिपॉजिट में ब्याज से होने वाले लाभ पर टैक्स भर चुके हैं तो उन्हें ITR फाइल करते समय ब्याज से होने वाली आय का जिक्र नहीं करना होगा। लेकिन अगर आप 20 से 30 फीसदी के टैक्स स्लैब में आते हैं तो आपको ब्याज से होने वाली आय का जिक्र करना होगा।
अगर निवेश बिना किसी रिस्क के करना हो तो आरडी करनी चाहिए। अगर आपके पास कोई खास फाइनेंशियल लक्ष्य हासिल करने में ज्यादा वक्त ना बचा हो तो 2-3 साल की आरडी फाइनेंशियल लक्ष्य हासिल करने में मददगार रहती है।
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