नयी दिल्ली। मोदी सरकार ने करीब एक महीने पहले अगरबत्ती बनाने में लगे कारीगरों को फायदा पहुंचाने के लिए ग्रामोदय विकास योजना को मंजूरी दी थी। अब सरकार ने इस योजना के तहत ज्यादा लोगों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से इसका आकार बढ़ाने का फैसला लिया है। योजना के नए दिशानिर्देशों के मुताबिक इसका कुल साइज 2.66 करोड़ रुपये से बढ़ा कर 55 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इससे पहले के अनुमानित लगभग 500 कारीगरों की तुलना में 6,500 कारीगरों को लाभ होगा। एमएसएमई मंत्रालय के तहत खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) इस कार्यक्रम को लागू करेगा और कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को संभालेगा।
सरकार आईआईटी / एनआईटी और यूपी के कन्नौज जिले में स्वाद और सुगंध विकास केंद्र में 2.20 करोड़ रुपये की लागत के दो केंद्रों की स्थापना करेगी। इन केंद्रों में अगरबत्ती के सभी कार्यों, जैसे सुगंध और पैकेजिंग में इनोवेशन, नए / वैकल्पिक कच्चे माल का उपयोग, फूलों का दोबारा इस्तेमाल और बांस की छड़ियों की आपूर्ति, को किया जाएगा। मंत्रालय की 'पारंपरिक उद्योगों के उन्नयन एवं पुनर्निर्माण के लिए कोष की योजना (स्फूर्ति) योजना के तहत मार्केटिंग लिंक के साथ 10 क्लस्टर भी स्थापित किए जाएंगे। सरकार को उम्मीद है कि इससे लगभग 5,000 कारीगरों को लाभ होने की उम्मीद है, जिन्हें टिकाऊ रोजगार और बेहतर कमाई का मौका मिलेगा।
सरकार की तरफ से बयान में कहा गया है कि इस कार्यक्रम में देश में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए मशीन मैन्यूफफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करना" भी शामिल होगा। 4 सितंबर को घोषित संशोधित कार्यक्रम के तहत भारत में 20 पायलट परियोजनाओं के माध्यम से एसएचजी और लोगों को 500 अतिरिक्त पेडल-संचालित मशीनों के अलावा पहले से तय 200 के बजाय 400 ऑटोमैटिक अगरबत्ती बनाने की मशीनें दी जाएंगी। इस कार्यक्रम से लगभग 1,500 कारीगरों को लाभ होगा, जिन्हें बढ़ी हुई इनकम के साथ स्थायी रोजगार मिलेगा। हाथ से बनने वाली अगरबत्ती और प्रवासी कामगारों को इसमें प्राथमिकता दी जाएगी। इन कारीगरों को तत्काल सहायता राशि 3.45 करोड़ रुपये होगी।
इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इस साल की शुरुआत में बांस की छड़ियों पर आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया था। केवीसी ने कहा था कि इस कदम से अगरबत्ती उद्योग में 8-10 महीनों में कम से कम 1 लाख रोजगार पैदा होंगे। इस बढ़ोतरी के पीछे मकसद आत्मनिर्भर भारत के लिए घरेलू बांस को बढ़ावा देना था।
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