Odisha News: ओ़डिशा के पांच जिलों में 700 अरंडी-आधारित एरी रेशम खेती की जा रही है। राज्य सरकार ने दो हजार किसानों को 'करुणा रेशम' परियोजना का विस्तार किया है। यह परियोजना अब 12 जिलों में शुरू की जा रही है। दरअसल, प्रोजेक्ट के तहत एरी रेशमकीड़ों से रेशम बनाने की अगल तरीका है।

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ओडिशा सरकार के रेशन बनाने के लिए शुरू किए नए प्रोजेक्ट को काफी पसंद किया जा रहा है। पिछले साल अक्टूबर में पांच जिलों - क्योंझर, अथागढ़, खुर्दा, नयागढ़ और सुंदरगढ़ में शुरू किया गया था। विभाग ने एरी रेशमकीट बीज उत्पादन केंद्र, होसुर से 30,000 एरी रेशम अंडे खरीदे और जिलों के 700 किसानों, मुख्य रूप से महिलाओं को इसमें शामिल किया। जबकि लक्ष्य 50 क्विंटल कीड़े वाले कोकून उगाने का था, पांच जिलों ने 82 क्विंटल का उत्पादन किया। स्टॉक से, 12.8 क्विंटल खाली कोकून उत्पन्न किए गए और सूत का उत्पादन करने के लिए काता गया।

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बता दें कि कुल स्टॉक से लगभग 40 प्रतिशत यार्न बरामद कर लिया गया। उत्पन्न सूत के पहले बैच का उपयोग इस वर्ष पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ और उनके दिव्य भाई-बहनों के लिए गीता गोविंदा खंडुआ पाटा बुनने के लिए किया गया था।

ओडिशा में करुणा सिल्क प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2022 में पांच जिलों - क्योंझर, अथागढ़, खुर्दा, नयागढ़ और सुंदरगढ़ में शुरू की गई थी। एक वर्ष के भीतर प्रोजेक्ट को 2 और जिलों में शुरू हो चुका है। ओडिशा सरकार के प्रोजेक्ट के तहत करीब दो हजार से अधिक किसानों को जोड़ा गया है।

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ओडिशा में करूणा रेशम प्रोजेक्‍ट के तहत रेशम बनाने में एक भी कीड़े को मारा नहीं जाता। नई तकनीकी रेशम के कीड़ो को मारकर उससे रेशम का धागा बनाने की परंपरा से बिलकुल अलग है। इस विधि से रेशम बनाने में कोकून को जीवित कीड़े के साथ उबालने के बाद इसे निकाला जाता है। इस उद्देश्य से विभाग ने अरंडी आधारित एरिकल्चर को अपनाया है।

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ये है पुराना तरीका
दरअसल, सामान्य शहतूत रेशम की साड़ी 10,000 से 20,000 रेशम के कीड़ों को मारकर बनाई जाती है। इसी तरह पारंपरिक प्रक्रिया में एक टसर सिल्क साड़ी बनाने में 5,000 से 7,000 रेशम के कीड़ों की जान चली जाती है।