ओडिशा में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ ओडिशा के शोधकर्ताओं ने कोरापुट में तीन स्वदेशी बाजार की किस्म की पहचान की है। ये तीनों फसलें पोषण से काफी भरपूर हैं, इनमे उच्च स्तर का पोषक तत्व मौजूद हैं जिनमे बेहतर खाद्य श्रंखला बनाने की क्षमता है। बाजरा की इन तीन स्वदेशी फसलों की पहचान मामी, कालिया और बड़ा के रूप में हुई है। इन छोटे बाजरों को मुख्य रूप से आदिवासी उगाते हैं। इसमे प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, ऊर्जा, फ्लेवोनोइड्स, विटामिन-सी, एंटीऑक्सिडेंट, आयरन और जिंक पाई जाती है।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि ओयूएटी-बेरहामपुर द्वारा विकसित उन्नत ओएलएम 208 किस्म अन्य स्थानीय रूप से उगाई जाने वाली बाजरा किस्मों की तुलना में पोषण की दृष्टि से काफी बेहतर हैं। छोटा बाजरा जीनोटाइप आदिवासी निवासियों की पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करेंगे और इसमे क्षमता है कि इसे मू्ल्यपरक पोषक खाद्य के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

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सीयूओ में जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर देबब्रत पांडा ने बताया कि जीनोटाइप की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए इस जीनोटाइप में भविष्य में ब्रीडिंग कार्यक्रम शुरू करने की पूरी क्षणता है। जिसके जरिए इसकी गुणवत्ता को और भी बेहतर किया जा सकता है। पोषक तत्वों के मामले में मामी, कालिया और बड़ा किस्में अन्य किस्मों से कहीं बेहतर हैं। गौर करने वाली बात है कि पिछले वर्ष भी जिले में पारंपरिक तरीके से उगाई जाने वाली कुछ बाजरा किस्मों की पहचान की गई थी, जिसमें पोषक तत्व और उपज के गुण देखने को मिले थे। उस वक्त तेलुगू, बड़ा और दशहरा नाम की तीन किस्में पाई गई थीं, जिसमे उच्च प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और ऊर्जा सामग्री और फ्लेवोनोइड और एंटीऑक्सिडेंट पाया गया था।