Repo Rate and Reverse Repo Rate: आज से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग शुरू होगी और यह मीटिंग 7 जून तक चलेगी। इस मीटिंग में भी रेपो रेट(इंटरेस्ट रेट) में बदलाव होने की उम्मीद कम है, RBI ने इससे पहले अप्रैल में हुई बैठक में ब्याज दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की थी।

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रेपो रेट का असर आपकी लोन ईमआई पर भी पड़ता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या होते हैं। चलिए इसके बारे में आपको पूरी जानकारी देते हैं।

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जान लीजिए क्या होता है रेपो रेट

जैसे आप बैंक से आर्थिक मदद के तौर पर लोन लेते हैं और उसे आप इंटरस्टे रेट के साथ भरते हैं तो ठीक उस प्रकार कमर्शियल बैंकों को भी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लोन लेने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से कमर्शियल बैंकों को लोन दिया जाता है। इसे रेपो रेट कहा जाता है।

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रेपो रेट का बोझ बैंक से होते हुए ग्राहकों तक पहुंच जाता है। बैंक की ब्याज दर बढ़ती है और होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन जो भी लोन आपने लिए होते हैं उसकी ब्याज दरें बढ़ जाती है।

रिवर्स रेपो रेट क्या होता है

वहीं, रिवर्स रेपो रेट की बात करें तो यह वह ब्याज दर है जिस पर आरबीआई कमर्शियल बैंकों से कर्ज लेता है यानी जिस दर पर बैंकों के आरबीआई में जमा पैसे पर ब्याज मिलता है।

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यह रिवर्स रेपो रेट होता है। रिवर्स रेपो रेट में बहुत कम बदलाव होता है। कमर्शियल बैंक केंद्रीय बैंक में अपने अतिरिक्त धन को जमा करती है, इसपर रिवर्स रेपो रेट का भुगतान करना होता है।

रेपो रेट से आपकी लोन ईमआई पर पड़ेगा असर

जब रेपो रेट ज्यादा होता है तो बैंकों को आरबीआई से मिलने वाले कर्ज महंगा हो जाता है। इसके बाद बैंक अपने बोझ को कम करने के लिए ग्राहकों पर इसका प्रेशर डाल देते हैं।

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लोन की ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर देते हैं। ब्याज दर बढ़ते ही आपका पर्सनल लोन, होम लोन, कार लोन समेत कई लेन महंगा हो जाता है। लोन की ब्याज दर बढ़ते ही आपके लोन की EMI बढ़ जाती है।

जब महंगाई बहुत अधिक हो जाती है तो आरबीआई रेपो रेट बढ़कर इकोनॉमी में मनी फ्लो को कम करने की कोशिश करता है। रेपो रेट ज्यादा होगा तो बैंकों को आरबीआई से मिलने वाला कर्ज महंगा होगा।

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लोन महंगा कर देने से इकोनॉमी में मनी फ्लो कम होगा। मनी फ्लो कम होगा तो डिमांड में कमी आएगी और महंगाई घटेगी।

वहीं, अगर इकोनॉमी बुरे दौर से गुजरती है तो रिकवरी के लिए मनी फ्लो बढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में RBI रेपो रेट कम कर देता है। इससे बैंकों को RBI से मिलने वाला कर्ज सस्ता हो जाता है और ग्राहकों को भी सस्ती दर पर लोन मिलता है।

आपको बता दें कि मॉनेटरी पॉलिसी की मीटिंग हर दो महीने में होती है। ये वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी मीटिंग होगी। इस मीटिंग में RBI रेपो रेट यानी इंटरेस्ट रेट में बदलाव की उम्मीद कम जताई जा रही है।