आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 3 से 5 जून तक चलेगी और ब्याज दरों पर फैसला 5 जून को आएगा। रेपो रेट में बदलाव का सीधा असर आपकी EMI, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और SIP की रफ्तार पर पड़ता है। हालांकि इसका असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन पॉलिसी के आसपास सही फैसले लेना काफी फायदेमंद रहता है। अगले 24 से 72 घंटों के लिए यह रहा आपका 'एक्शन प्लान'।

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रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज देता है। बैंक इसी के आधार पर अपने लोन और शॉर्ट-टर्म डिपॉजिट की दरें तय करते हैं। जब रेपो रेट बदलता है, तो फ्लोटिंग EMI पर इसका असर फिक्स्ड रेट के मुकाबले जल्दी दिखता है। वहीं, डिपॉजिट यानी FD की दरों में बदलाव थोड़ा रुककर आता है। इस गणित को समझकर आप प्री-पेमेंट, रिफाइनेंसिंग और नई FD जैसे फैसले बेहतर तरीके से ले सकते हैं।

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RBI पॉलिसी के 3 संभावित नतीजे: अगले 72 घंटों में आपको क्या करना चाहिए?

सबसे पहले अपने लोन का टाइप, रिसेट डेट और बेंचमार्क चेक करें। अगर दरें स्थिर रहती हैं, तो कैश फ्लो बनाए रखें और रिसेट डेट के पास छोटा प्री-पेमेंट करने की योजना बनाएं। अगर दरों में कटौती होती है, तो रिफाइनेंसिंग या इंटरनल रिसेट का फायदा उठाएं। वहीं, दरें बढ़ने पर पार्ट-पेमेंट करना समझदारी होगी। नीचे दी गई टेबल से समझें कि आपको क्या कदम उठाने हैं:

स्थितिEMI पर असरकर्जदारों के लिए सलाह (24-72h)बचत करने वालों के लिए सलाह (24-72h)
कोई बदलाव नहीं (Hold)तुरंत कोई बदलाव नहीं; अगली रिसेट डेट पर नजर रखें।रिसेट डेट के पास छोटा प्री-पेमेंट करें; स्प्रेड चेक करें और जल्दबाजी में लोन ट्रांसफर न करें।FD लैडरिंग (3-6-12 महीने) अपनाएं; नए मौकों के लिए कैश तैयार रखें।
0.25% की कटौतीफ्लोटिंग लोन की EMI रिसेट डेट पर थोड़ी कम होगी।इंटरनल रिसेट के लिए बैंक से बात करें; अगर दरों में 0.50% से ज्यादा का फर्क हो तो रिफाइनेंसिंग सोचें।लंबी अवधि की FD लॉक करें; कम समय के लिए शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फंड्स बेहतर हैं।
0.25% की बढ़ोतरीफ्लोटिंग लोन की EMI रिसेट डेट पर थोड़ी बढ़ेगी।1-2 EMI के बराबर प्री-पेमेंट करें; लोन की अवधि (Tenure) तभी बढ़ाएं जब बजट बहुत टाइट हो।कम अवधि वाली FD चुनें; लंबी अवधि के लिए अभी रुकें और रिकरिंग डिपॉजिट (RD) का इस्तेमाल करें।

FD लैडरिंग और SIP vs लम्पसम: पॉलिसी से पहले क्या है बेस्ट?

लिक्विडिटी और मुनाफे के बीच तालमेल बिठाने के लिए 'FD लैडरिंग' का इस्तेमाल करें। अपने पैसे को 3, 6 और 12 महीनों की अलग-अलग FD में बांटें और मैच्योर होने पर उन्हें रिन्यू करते रहें। शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फंड्स भी एक विकल्प हैं, लेकिन इनमें मार्केट रिस्क रहता है। अपनी SIP जारी रखें और अगर एकमुश्त (Lump sum) निवेश करना है, तो उसे 2 से 4 हफ्तों के टुकड़ों में बांटकर करें। सही फैसले के लिए EMI और FD कैलकुलेटर की मदद जरूर लें।

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FD ब्याज दरों की तुलना: 5, 10 और 15 साल में कितनी बढ़ेगी आपकी रकम

1,00,000 रुपये पर अनुमानित रिटर्न (टैक्स से पहले, सालाना कंपाउंडिंग)
सालाना दर5 साल10 साल15 साल
6.5%1,37,0001,87,7002,57,100
7.0%1,40,3001,96,7002,75,700
7.5%1,43,6002,06,1002,96,000