नई दिल्ली, फरवरी 22। डेब्ट म्यूचुअल फंड ऐसी स्कीमें होती हैं जो सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड जैसे फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट्स या ट्रेजरी बिल जैसे मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करती हैं। ये स्कीमें निवेशकों को थोड़ा कम मुनाफा कराती हैं, मगर उच्च स्तर की सुरक्षा देती हैं। इससे निवेशकों को कम जोखिम के साथ अपने पोर्टफोलियो को संतुलित करने में मदद मिलती है। इन्हें फिक्स्ड इनकम फंड के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी योजनाओं को आम तौर पर इक्विटी-ओरिएंटेडेड योजनाओं की तुलना में कम जोखिम भरा माना जाता है क्योंकि ये स्थिर रिटर्न की पेशकश करती हैं। हालांकि, बढ़ती मुद्रास्फीति को मात देने के लिए इनसे मिलने वाला रिटर्न आम तौर पर पर्याप्त नहीं हो पाता। डेब्ट फंड के अपने जोखिम भी हैं। आइए जानते हैं क्या-क्या।

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क्रेडिट रिस्क

वे डेट इंस्ट्रूमेंट्स जिनमें डेट स्कीमें निवेश करती हैं, उनकी क्रेडिट रेटिंग अलग-अलग होती है। हाई रेटिंग वाले इंस्ट्रूमेंट्स द्वारा भुगतान में चूक की संभावना कम होती है। दूसरी ओर, यदि डेब्ट सिक्योरिटी की रेटिंग कम है, तो डिफ़ॉल्ट की संभावना अधिक होती है। बाकी उच्च रेटिंग भी इस बात की गारंटी नहीं देती कि उनका इश्युअर डिफॉल्ट नहीं कर सकता। डेब्ट योजनाओं के फंड मैनेजर आमतौर पर उच्च लेकिन रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न जनरेट करने के लिए विभिन्न इंस्ट्रूमेंट्स का मिक्स चुनते हैं।

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ब्याज दर

ध्यान देने वाली बात यह है कि बॉन्ड या रेगुलर इनकम सिक्योरिटीज की कीमतें उधार लेने की लागत या, सीधे शब्दों में कहें, तो ब्याज दरों के उलट आनुपातिक होती हैं। इसका मतलब है कि जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बॉन्ड की कीमतें घट जाती हैं। और इसके उलट तब होता है जब ब्याज दरें ऊपर की ओर बढ़ती हैं। डेब्ट फंड ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील होते हैं, ऐसे समय में जब दरें कम होती हैं, डेब्ट फंड बेहतर रिटर्न देते हैं।

मुद्रास्फीति और मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति

डेब्ट इंस्ट्रूमेंट्स सहित किसी भी निवेश के परफॉर्मेंस में मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों का मनी मार्केट पर प्रभाव पड़ता है जिससे मुद्रास्फीति, बॉन्ड और ब्याज दरों जैसे फैक्टरों पर उनका असर पड़ता है। निरंतर उच्च मुद्रास्फीति दर आम तौर पर केंद्रीय बैंक और सरकार को या तो ब्याज दरों को कम करके या सप्लाई साइड की डायनामिक्स में सुधार के लिए कार्रवाई करके इसे नियंत्रित करने के उपाय करती है। इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप डेब्ट निवेश को प्रभावित करते हैं।

फंड मैनेजर के गलत फैसले

निवेश करने के लिए बेहतर ऑप्शन उपकरणों को चुनने के लिए रिसर्च जरूरी है। कभी-कभी, डेब्ट स्कीमों के फंड मैनेजरों द्वारा की गई कुछ निवेश कॉल से मनचाहे परिणाम नहीं मिल पाते। अक्सर, जब कोई फंड कुछ ऐसे उपकरणों में निवेश करता है जो अप्रत्याशित रूप से डिफ़ॉल्ट होते हैं, तो योजनाओं के पोर्टफोलियो का की वैल्युएशन नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है।

नजरअंदाज न करें

निवेशकों को यह समझने की जरूरत है कि डेब्ट फंड भी, इक्विटी की तुलना में अपेक्षाकृत स्थिर होते हुए भी, जोखिम वाले होते हैं। यह मान लेना सही नहीं होगा कि ये पूरी तरह से रिस्क-फ्री हैं। अंतिम तीन जोखिम आम तौर पर अस्थायी होते हैं, मगर क्रेडिट जोखिम स्थायी होता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आप डेट फंडों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दें।