जब भी हम लोन के अप्लाई करते है, तो सिबिल स्कोर और सिबिल रैंक जैसे टर्म सुने को मिलते रहते हैं. सिबिल स्कोर और सिबिल रैंक के बेस पर यह तय किया जाता है कि आपको लोन मिलेगा या नहीं. इसके अलावा लोन पर मिलने वाला ब्याज दर पर इसी पर निर्भर होता है. चलिए आज इन दोनों के अंतर को समझते हैं.
अगर आप लोने लेने के बारे में सोच रहें है, तो आपके लिए सिबिल स्कोर और सिबिल रैंक के बीच में अंतर समझना काफी जरूरी है. यह दोनों ही किसी भी लोन का महत्वपूर्ण अंग है.
क्या होता है सिबिल स्कोर और सिबिल रैंक में अंतर?
सिबिल स्कोर किसी भी व्यक्ति के क्रेडिट हिस्ट्री के बारे में बताता है. कोई भी लोन लेते समय क्रेडिट स्कोर काफी मायने रखता है. क्रेडिट स्कोर के जरिए बैंक किसी भी व्यक्ति का क्रेडिट हिस्ट्री देख सकता है. इसके जरिए बैंक यह भी पता लगा सकता है कि आपने बीते सालों में समय पर लोन और क्रेडिट बिलों की पेमेंट की थी या नहीं. सिबिल स्कोर जितना अच्छा होगा, उतना आपको होम लोन बेहतर ब्याज में मिलने के उम्मीद होती है. इसके अलावा सिबिल रैंक कंपनियों के लिए होता है. यह कंपनियों का क्रेडिट रिपोर्ट (CCR) होता है.
सिबिल स्कोर 300 से 900 के बीच होता है. यह जितना ज्यादा होगा, लोन के लिए उतना ही अच्छा होता है. मतलब अगर आपका सिबिल स्कोर हाई है, तो आसानी से बैंक से लोन लिया जा सकता ही. वही सिबिल रैंक 1 से 10 नंबर के बीच होता है. नंबर 1 रैंक को सबसे अच्छा माना जाता है.
सिबिल स्कोर किसी भी व्यक्ति को उसके क्रेडिट हिस्ट्री के हिसाब से दिया जाता है. वहीं सिबिल रैंक 50 करोड़ रुपये तक के क्रेडिट एक्सपोजर वाली कंपनियों मिलता है.
ऐसा भी कह सकते है कि सिबिल स्कोर किसी भी व्यक्ति के क्रेडिट हिस्ट्री, रिपोर्ट और रेटिंग तय करता है. इसके जरिए बैंकों को ग्राहकों पर विश्वास होता है कि वह कितने भरोसे योग्य है. वहीं सिबिल रैंक को पिछले रिपेमेंट और क्रेडिट यूजेज के हिसाब से कैलकुलेट किया जाता है.
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