सन 2017 का साल बिटकॉइन के नाम से जाना जाएगा क्‍योंकि इस साल जितना बिटकॉइन की कीमत में उछाल आया है शायद ही इससे पहले कभी आया होगा। भले ही बीच में बिटकॉइन की कीमतों में थोड़ा बहुत गिरावट आयी हो लेकिन इसके बावजूद बिटकॉइन के प्रति लोगों की रुचि कम नहीं हुई है। यह एक ऐसी क्रिप्‍टोकरेंसी है जिसमें मैक्सिमम रिस्‍क होने के बाद भी लोग अपने पैसे लगाने में हिचक नहीं रहे हैं। तो आइए यहां पर जानते हैं कि बिटकॉइन की माइनिंग कैसे होती है?

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कॉइन का बनना

बिटकॉइन मैथमैटिक्‍स के फार्मूले से या कहें लॉगरिदम से बनाए जाते हैं। यह सबसे पहले 2009 में 50 कॉइन के साथ शुरु हुई थी। हर 10 मिनट में गणित के फार्मूले से नए कॉइन से बैच तैयार होते हैं। दुनिया के अन्‍य देशों के विपरीत क्रिप्‍टो करेंसी को बैंक या एक कंसोर्शम जैसी कोई सेंट्रल अथॉरिटी प्रोड्यूस नहीं करती। बिटकॉइन 'माइनिंग रिंग्‍स' कहे जाने वाले कंप्‍यूटर प्रोड्यूस करते हैं और ये कंप्‍यूटर इस वर्चुअल करेंसी को हासिल करने के लिए गणित की जटिल समस्‍याओं को हल करते हैं।

आप भी कर सकते हैं बिटकॉइन की माइनिंग

इन कॉइन की माइनिंग कोई भी कर सकता है, तो कोई कंप्‍यूटिंग पावर डेडिकेट करने की इच्‍छा रखता हो। बिटकॉइन के माइनर्स दो टास्‍क को पूरा करने के लिए ओपन सोर्स Software का इस्‍तेमाल करते हैं।

यह है प्रक्रिया

पहले माइनर्स नए बिटकॉइन ट्रांजेक्‍शन की वैलिडिटी कंफर्म करते हैं, जो पब्लिक लेजर में रिकॉर्ड किए जाने की प्रतीक्षा में होते हैं। इसके बाद, ब्‍लॉकचेन या पब्लिक लेजर में रिकॉर्ड दर्ज करने के लिए माइनर्स को बिटकॉइन फॉर्मूले से जेनरेट हुए यूनीक आइडी कोड को डिकोड करना होता है।

21 मिलियन कॉइन की लिमिट

बिटकॉइन फॉर्मूला में 21 मिलियन कॉइन की लिमिट है। उम्‍मीद की जा रही है कि इस सीमा को 2140 तक प्राप्‍त कर लिया जाएगा। माइनर्स को उनके काम के बदले बिटकॉइन मिलते हैं, जो बिटकॉइन एल्‍गोरिदम के जरिए अपने आप जनरेट होते हैं। ब्‍लॉकचेन हर बिटकॉइन ट्रांजेक्‍शन का रिकॉर्ड दर्ज करता है, जो सार्वजनिक होते हैं।