जब आप होम लोन लेते हैं तो आपके पास फ्लोटिंग ब्याज दर (परिवर्तनीय ब्याज दर) या निश्चित ब्याज (फिक्स्ड लोन) होम लोन लेने के बीच एक विकल्प होता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, निश्चित ब्याज दर का होम लोन लेने पर अवधि के दौरान कभी नहीं बदलता है जबकि परिवर्तनीय ब्याज दर इससे अलग है, आइए इसे एक उदाहण से समझते हैं।
एक व्यक्ति 10 फीसदी के तय ब्याज पर बैंक से होम लोन लेता है, अगर उसकी ईएमआई (किश्त)10,500 रुपए प्रति माह है, तो वह व्यक्ति पूरी अवधि के दौरान बैंक को 10,500 रुपए प्रति माह का भुगतान जारी रखेगा, जब-तक उसका लोन समाप्त नहीं हो जाता है।
दूसरी तरफ फ्लोंटिंग ब्याज दरें इस सिद्धांत पर काम नहीं करती हैं। ये ब्याज दर बाजार की स्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। इसका असर बैंक को देने वाली मासिक किश्त पर होता है। इसमें आपकी ईएमआई ऊपर-नीचे होती रहती है, अधिकतम समय ब्याज दरें एक मुख्य ऋण द्वारा निर्धारित होती हैं। मुख्य ऋण दर कम या ज्यादा होने पर ब्याज दर घटता बढ़ता रहता है। फ्लोटिंग होम लोन में बाजार के हिसाब से ब्याज दर तय होती है।
फ्लोटिंग ब्याज दरों के कम या ज्यादा होने का सबसे बड़ा और मुख्य कारण भारतीय रिजर्व बैंक की पॉलिसी पर निर्भर करता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का मानना है कि मुद्रास्फीति बढ़ रही है, तो रेपो रेट में में वृद्धि होगी, रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक, बैंकों को पैसा उधार देता है। जब रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंको के लिए पैसे की लागत अधिक हो जाती है। जिसकी वजह से बैंक अपने ग्राहकों के लिए ब्याज दर बढ़ा देते हैं।
ऐसा हमेशा नहीं होता है, लेकिन, अधिकतर समय इस प्रकार की स्थिति हो जाती है। दूसरी ओर भारतीय रिजर्व बैंक ऐसा लगता है कि मुद्रास्फीति (महंगाई की दर) गिर रही है तो वह अर्थव्यवस्था में विकास को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों को कम कर सकती है। ऐसा होने पर होम लोन पर फ्लोटिंग ब्याज दर बदल जाती।
एक बार फिर हम आपको ये बताना चाहते हैं कि फ्लोटिंग ब्याज दरों के कम या ज्यादा होने का यही एक मुख्य कारक नहीं है। ये बैंको पर भी निर्भर करता है कि वह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में परिवर्तन करने पर वह ब्याज दरों में परिवर्तन करें या ना करें। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बैंक ब्याज दरों पर निर्णय लेने से पहले अपने खुद के देनदारी परिसंपत्ति का विश्लेषण करता है।
इसके अलावा, विभिन्न अन्य कारक भी है जो ब्याज दरों में परिवर्तन से पहले आते हैं। उदाहरण के लिए रिजर्व बैंक ने पिछली कई तिमाहियों में 150 आधार अंकों की रेपो दर में कमी की है, बैंकों की ब्याज दरों में समान राशि से कटौती नहीं की है। इसका कारण ये है कि वे गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (नॉन परफॉर्मिंग एसेट), को अपने निर्णय के अनुसार तय कर रहे हैं।
ये हमेशा रेपो रेट पर निर्भर नहीं करता है इसीलिए ये कहा जा सकता है कि रेपो रेट मासिक किश्त नहीं तय करता है फिर भी ये एक सबसे महत्वपूर्ण कारक है कि भारत में फ्लोटिंग ब्याज दर, होम लोने के ब्याज दरों की ईएमआई को प्रभावित करता है।
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